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Tuesday, March 31, 2020

सरकार कोरोनोवायरस प्रकोप को लेकर गंभीर क्यों नहीं है, वह क्यों इसे हिंदू-मुस्लिम मुद्दा बनाना चाहती है?

Coronavirus outbreak: तबलीगी जमात एक बहाना है अपनी नाकामी छुपाना है, करोनोलॉजी समझए.
मोटा भाई (Amit Shah) जो लोकडाउन के बाद से ही गायब थे, अब समझ में आया वह मौके का इंतजार कर रहे थे और एक नया पलान बना रहे थे जैसे ही उसने देखा कि सारा देश, बलकि सारी दुनया के लोग लॉकडाउन के कारण भुखमरी से मरने वाले मजदूर और सड़कों पर भटक रहे हजारों लोगों पर बात करने लगे हैं और मोदी और शाह की कमजोर रणनिती की निंदा कर रहे हैं तो उसने अपनी नाकामी को छुपाने और असल  मुद्दे से भटकाओ और राज करो की अपनी नीति से राजनीतिक लाभ पाने के लिए पुलिस और मीडिया को काम पर लगा दिया और फिर मीडिया ने कोरोना जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम मुद्दा बनाने में कोई कसर नही छोड़ी।
coronavirus outbreak
Why the government is not serious about the coronavirus outbreak, it wants to make it a Hindu-Muslim issue.

Coronavirus outbreak: Tablighi Jamaat is an excuse to hide government failure, understand the chronology.

सरकार कोरोनोवायरस प्रकोप को लेकर गंभीर क्यों नहीं है?

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च को दुनिया के सबसे बड़े लॉकडाउन की घोषणा की और 1.3 बिलियन भारतीयों को COVID-19 के प्रसार को धीमा करने के लिए 21 दिनों के लिए घर में रहने के लिए कहा। 
यह कदम आंशिक रूप से सर्वनाश संबंधी अनुमानों (apocalyptic projections) की प्रतिक्रिया थी। मोदी की घोषणा के समय 600 से अधिक मामलों की पुष्टि की गई थीहालांकि उस संख्या को व्यापक रूप से अंडरकाउंट माना जाता है। लेकिन नियंत्रण उपायों के बिनाएक मॉडल के अनुसार 300 मिलियन से 500 मिलियन भारतीय जुलाई के अंत तक संक्रमित हो सकते हैं और 30 मिलियन से 50 मिलियन तक गंभीर बीमार हो सकते हैं।

और दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश में बड़ी संख्या में गरीबों की भीड़असमान स्थिति और कमजोर सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे हैंइटली के 3.4 और संयुक्त राज्य अमेरिका के 2.9 की तुलना में प्रति 1000 व्यक्तियों पर सिर्फ 0.7 अस्पताल बेड हैंभारत में 50,000 से कम वेंटिलेटर हैं।

सेंटर फॉर डिसीज डायनेमिक्सइकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी के संस्थापक और निदेशक Ramanan Laxminarayan कहते हैं, "भारत संभवतः पहला बड़ा विकासशील देश और लोकतंत्र हैजिसमें यह महामारी आएगी।" भारत सरकार को सलाह दे रहे लक्ष्मीनारायण कहते हैं. चीन के नियंत्रण और यूरोप या अमेरिका की स्वास्थ्य प्रणालियों के कई फायदे भारत के लिए उपलब्ध नहीं हैं, COVID-19 के लिए एक विशिष्ट भारतीय प्रतिक्रिया होनी चाहिए।"

मोदी के लॉकडाउन का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पड़ा हैअमीर देशों के लॉकडाउन की तुलना से भी तेज।
लाखों भारतीय जो अपने दैनिक भोजन के लिए प्रत्येक दिन की मजदूरी पर निर्भर हैंउन्हें काम से बाहर कर दिया गया।
प्रवासी श्रमिक बसों और ट्रेनों के जरिए घर वापस हुएसंभवतः वायरस को ग्रामीण क्षेत्रों में ले जाने का कारण बने। और जैसा कि परिवहन विकल्प खतम हो गयानई दिल्ली और अन्य प्रमुख शहरों में रह रहे कई परिवारों ने भोजन तक पहुंच न होने के कारणदूर अपने गांवों की तरफ पैदल चलना ही शुरू कर दिया।
"हम एक सामाजिक संकट को सामाजिक आर्थिक संकट में बदलने का जोखिम उठा रहे हैं,"  रवि दुग्गलएक सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता कहते हैं।

वर्तमान मेंभारत में COVID-19  से संक्रमित 1,500 से अधिक लोग हैं और संक्रमण के कारण मृत्यु की 38 घटनाएं हुई हैं। अधिक संक्रमित लोगों के साथ 40 देश हैं और 30 देशों में भारत की तुलना में एक उच्च मृत्यु टोल हैएक IE रिपोर्ट बताती है।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के अनुसारभले ही कुछ मामले हैं जिनमें मूल स्रोत का पता नहीं लगाया जा सकता हैभारत सामुदायिक संचरण के चरण तक पहुंचने वाला है। इस बीचकुछ वैज्ञानिकों ने शोध पत्रों का हवाला देते हुए कहा है कि कॉरोनोवायरस जो COVID-19 का कारण बनता हैयह बताने के लिए गर्म तापमान में जीवित नहीं रह सकता है कि भारत में मामले कम क्यों हैं। हालांकि सतर्कता का एक शब्द: देश इस COVID-19 महामारी को युद्धस्तर पर लड़ रहे हैंजिसका अर्थ है कि संक्रमित व्यक्तियों और मौतों की संख्या बदलती रहेगी।

दुग्गल और अन्य अधिवक्ताओं ने भारत के बड़े पैमाने पर बंद होने की आलोचना करते हुए कहा कि क्षेत्र-विशिष्ट लॉकडाउन भारत में अधिक मानवीय और व्यावहारिक से अधिक हैं। लेकिन ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय तालाबंदी की जरूरत थी।
शाहिद जमीलएक भारतीय वीरोलॉजिस्ट और वेलकम ट्रस्ट / डीबीटी इंडिया एलायंस के प्रमुख हैंपिछले हफ्तों में किए गए उपायों को शामिल करते हैं - जिनमें अंतर्राष्ट्रीय आगमन को रोकना शामिल है - इन उपायों ने मामलों में वृद्धि की दर को धीमा नहीं किया क्योंकि बहुत देर हो चुकी थी। "अन्य देशों के अनुभव से पता चला है कि यदि आप जल्दी ताला लगातेयदि आप खुद को वक्र पर जल्दी पकड़तेतो ये प्रसार को सीमित करने का एक बेहतर मौका था," वे कहते हैं।

कोरोनावायरस प्रकोप: तबलीगी जमात एक बहाना है अपनी नाकामी छुपाना है

भारत सरकार बहुत कमजोर सरकार है। सरकार भारतीयों के लिए कुछ भी करने का लक्ष्य नहीं रखती है लेकिन वह अपनी सरकार बनानेमीडिया को संभालने और भारतीय समुदायों को विभाजित करने के लिए अपनी सारी ऊर्जा खर्च करती है।

मैं मानता हूं कि लॉकडाउन की जरूरत थीलेकिन लॉकडाउन की घोषणा के बादसरकार ने गरीब और भूखे लोगों के लिए कुछ नहीं किया। भारत में बहुत से लोग पैसे की कमी और दैनिक जीवन की आवश्यकताओं के न होने कारण जीवित रहने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं बहुतों के भूकमरी से मरने की खबर आ रही हैसरकार ने केवल राहत राशि ऐलान किया है और इसके नाम पर कड़ोड़ों रूपे का चंदा सरकार को मिला है लेकिन सब जानते हैं कि इन रूपों का इसतेमाल केवल MLAs खरीदने के लिए और और अमीरों का जेब भरने के लिए ही किया जाएगा गरीब तो मुंह तकते ही रह जाऐंगे।

मैं भारतीय लोगों से कहना चाहता हूं कि आप कोरोनोवायरस के प्रकोप से अपनी और अपने  परिवार की रक्षा खुद करेंसुरक्षात्मक दिशानिर्देशों का पालन करें और घर पर रहेंनियम-कानून न तोड़ेंसरकार मंसुबा बना रही है कि सरकारी विफलता को छिपाने के लिए कैसे एक विशिष्ट समुदाय को लक्षित किया जा सकता है जैसा आज पुरे दिन राजधानी दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन के मरकज को कोरोनावायरस फैलाव का जिममेदार ठहराया जा रहा है जबकि तथ्य यह है कि यह एक सरकारी विफलता है जब मरकज़ ने पुलिस को सूचित करदिया था कि यहां 1000 से अधिक लोग अचानक राष्ट्रीय बंदी के कारण फंस गए हैं तो पुलिस और सरकार ने तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं की और जब वहां कुछ लोगों में कोरोना पॉजिटिव पाया गया तो अब सरकार कह रही है कि कोरोनावायरस फैलाव का जिममेदार मरकज है। कमाल है!

असल मामला क्या है?

मामला यह है कि हजरत निजामुद्दीन के मरकज में से 15 मार्च तक तबलीगी जमात में भाग लेने के लिए 2000 से अधिक लोग पहुंचे थे।
इसमें विभिन्न राज्यों और विदेशों के कुल 1830 लोगों ने मरकज में भाग लियाजबकि मरकज और दिल्ली के आसपास 500 से अधिक लोग थे।
तबलीगी जमात द्वारा एक प्रेस बयान जारी किया गया है। जिसमें यह कहा गया है कि तब्लीग-ए-जमात 100 साल से अधिक पुरानी एक संस्था हैजिसका मुख्यालय दिल्ली के एक शहर निज़ामुद्दीन में है।
देश-विदेश के लोग यहां लगातार आते रहते हैं। यह सिलसिला लगातार जारी है जिसमें लोग दो दिनपांच दिन या 40 दिन के लिए आते हैं। लोग मरकज में रहते हैं और यहीं से तबलीग का काम करते है।

बयान में कहा गया है कि जब भारत में जनता कर्फ्यू की घोषणा की गईउस समय बहुत सारे लोग मरकज में रह रहे थे।
22 मार्च कोप्रधानमंत्री ने जनता कर्फ्यू की घोषणा की। उसी दिन मरकज को बंद कर दिया गया था। किसी भी आदमी को बाहर से आने की इजाजत नहीं थी। मरकज वहां रहने वालों को घर भेजने की व्यवस्था करने का पूरा परयास कर रहा था।
21 मार्च सेरेल सेवाएं बंद हो गई थींइसलिए लोगों को बाहर भेजना मुश्किल था। फिर भीदिल्ली और आसपास के 1500 लोगों को घर भेज दिया गया फिर भी मरकज़ में लगभग 1000 लोग बच गए थे।

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के आदेश को मानते हुए लोगों को बाहर भेजना सही नहीं था। उन्हें मरकज में रखना बेहतर था।
24 मार्च कोअचानक SHO निजामुद्दीन ने हमें नोटिस भेजा कि हम धारा 144 का उल्लंघन कर रहे हैं। मर्कज कमिटी ने जवाब दिया कि मरकज़ को बंद कर दिया गया है। 1500 लोगों को उनके घरों में भेजा गया है। अब 1000 बचे हैंजिन्हें भेजना मुश्किल हैक्योंकि वे दूसरे राज्यों और विदेशों से आए हैं।

हमने एसडीएम के पास अर्जी दी और 17 गाड़ियों के लिए कर्फ्यू पास के लिए कहाताकि मरकज में फंसे लोगों को घर भेजा जा सके मगर हमें अभी तक पास जारी नहीं किया गया है।
25 मार्च को तहसीलदार और एक मेडिकल टीम आई और उन्होंने लोगों की जांच की।
26 मार्च को हमें एसडीएम कार्यालय बुलाया गया और हमने डीएम से भी मुलाकात की। हमने फंसे हुए लोगों के बारे में जानकारी दी और कर्फ्यू पास करने के लिए कहा।
27 मार्च को लोगों को बीमार होने के कारण मेडिकल परीक्षण के लिए ले जाया गया था।
28 मार्च कोएसडीएम और डब्ल्यूएचओ की टीमों ने 33 लोगों को जांच के लिए राजीव गांधी कैंसर अस्पताल ले गई।

28 मार्च को एसीपी लाजपत नगर की ओर से एक नोटिस आया कि हम दिशानिर्देशों और कानून का उल्लंघन कर रहे हैं। हमने दूसरे दिन ही जवाब भेजा और पूरी स्थिति से आगाह किया।
30 मार्च को सोशल मीडिया पर अचानक यह खबर फैल गई कि COVID-19 के मरीजों को मर्कज में रखा गया है और पुलिस वहां रेड कर रही है।

निजामुद्दीन मामले पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी गैर जिम्मेदाराना भूमिका निभाई और वहां फंसे लोगों को वहां से निकालने में मरकज की कोई मदद नहीं की और उलटा उन लोगों पर मुकदमा दर्ज करने के आदेश दे दिए।
मरकज ने कहा कि अगर उनको हकीकत मालूम थी तो फिर वह ऐसा कैसे बोल रहे हैं। हमने लगातार पुलिस और अधिकारियों को जानकारी दी के हमारे यहां लोग फंसे हुए हैं और वह लोग पहले से यहां आए हुए थे।
प्रधानमंत्री के लॉकडाउन आदेश के बाद हमने किसी को भी बस अड्डा या सड़कों पर घूमने नहीं दिया और मरकज में बन्द रखा हमने ज़िम्मेदारी से काम किया।

#CoronaJihad: Shame on Indian Godi Media

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार की पूर्व में उस तरह से आलोचना की गई थी जिस तरह से मोदी ने इसे बंद करने के कुछ घंटे पहले ही तालाबंदी की घोषणा कर दी थी।

घोषणा के थोड़े समय ने शहरों में फंसे सैकड़ों हजारों प्रवासी श्रमिकों को बेयारो मददगार छोड़ दिया, जिससे मजबूरन कई लोगों को अपने गाँव तक सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने का प्रयास करना पड़ा। फंसे श्रमिकों की तस्वीरों ने मोदी सरकार की खराब  कोरोनावायरस रणनिती को खोल कर रख दिया।

मरकज़ निज़ामुद्दीन की घटना ने तब से भाजपा सरकार के समर्थकों को सरकार की विफलता को छिपाने और वायरस फैलाने के लिए मुसलमानों पर हमला करने का अवसर मिल गया है।

इस खबर के सुर्खियों में आने के तुरंत बाद, ट्विटर पर हैशटैग #CoronaJihad ट्रेंड करने लगा, जिसमें कई ट्वीट मुसलमानों को भारत में कोरोनावायरस के प्रसार के लिए दोषी ठहराते नजर आ रहे हैं।

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने यह भी बताया कि बहुसंख्यक धर्मों के लोगों द्वारा इसी तरह की सभाएं की गईं मगर अधिकारियों द्वारा इस तरह के त्वरित ध्यान को आकर्षित नहीं किया गया।

तब्लीगी जमात मण्डली के दो दिन बाद, महाराष्ट्र के साईं बाबा मंदिर में बड़ी संख्या में हिंदू तीर्थयात्री एकत्रित हुए थे।

कुछ दिनों पहले, मध्य मध्य प्रदेश राज्य में, सत्तारूढ़ भाजपा के शिवराज सिंह चौहान ने एक बड़ी भीड़ के बीच मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, जिसमें मोदी द्वारा सामाजिक दूरी के संदेश की अनदेखी की गई।

मोदी द्वारा लॉकडाउन की घोषणा करने के एक दिन बाद, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लॉकडाउन नियमों का स्पष्ट रूप से उल्लंघन करते हुए  अयोध्या शहर में एक समूह धार्मिक समारोह का आयोजन किया था।

करोनोलॉजी समझए

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 17 मार्च को ही तब्लीगी जमात से जुड़े एक व्यक्ति में कोरोना केस 17 मार्च को ही मिला था। सुरक्षा एजेंसियों और आंतरिक मंत्रालय को इस बात की जानकारी पहले से ही थी कि  विदेश के कितने लोग देश के अलग अलग हिससे में घूम रहे हैं।

मगर मोटा भाई जो लोकडाउन के बाद से ही गायब थे, अब समझ में आया वह मौके का इंतजार कर रहे थे और एक नया पलान बना रहे थे जैसे ही उसने देखा कि सारा देश, बलकि सारी दुनया के लोग लॉकडाउन के कारण भुखमरी से मरने वाले मजदूर और सड़कों पर भटक रहे हजारों लोगों पर बात करने लगे हैं और मोदी और शाह की कमजोर रणनिती की निंदा कर रहे हैं तो उसने अपनी नाकामी को छुपाने और असल  मुद्दे से भटकाओ और राज करो की अपनी नीति से राजनीतिक लाभ पाने के लिए पुलिस और मीडिया को काम पर लगा दिया और फिर मीडिया ने कोरोना जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे को हिन्दू-मुस्लिम मुद्दा बनाने में कोई कसर नही छोड़ी।

केजरीवाल शायद इस रणनीति को पहले ही समझ चुके थे, इसलिए उसने एक कदम आगे बढ़कर साद मौलाना पर हाथ डालने का फैसला किया और उनके खिलाफ FIR कटवा दिया।
याद कीजिए ये वही केजरीवाल है जिसने दिल्ली दंगे पर कोई कारवाई नहीं की और बहाना बना दिया कि कानून व्यवस्था हमारे हाथ में नहीं है चलो मान लिया मगर उसने दिल्ली दंगे को रोकने और उसमें मारे गए लोगों के लिए कुछ भी क्यों नहीं किया तो फिर आज उसने जो कुछ किया है ये क्या है? अब लोगों को केजरीवाल के दो मुहा होने को समझ जाना चाहिए। केजरीवाल भी मोदी की तरह धर्म के नाम पर राजनीति करने लगा है, यह भी इंसानियत की भलाई को छोड़ कर राजनीति लाभ पाने की रणनिती को अपना रहा है शायद ये भी मोदी की तरह PM बनना चाहता है।

इस मामले में डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया,  "आप" विधायक Atishi Marlena की ट्विटर पर असाधारण गतिविधि देखने लायक है, जबकि AAP के ही एक विधायक अमानतुल्ला खान भी ट्विटर पर सक्रिय कार्यकर्ता हैं और पुलिस और मीडिया सहित अपनी ही पार्टी और सरकार पर जवाबी हमला कर रहे हैं।

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