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Thursday, February 27, 2020

दिल्ली में हिंसा कैसे भड़की और कौन है इस खूनी खेल का जिम्मेदार?

उत्तरी दिल्ली में पूरी योजना के साथ, मुस्लिम घरों, दुकानों और संपत्तियों को जला दिया गया, लूट लिया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्रम्प का स्वागत करने में व्यस्त थे और गृह मंत्री अमित शाह की नींद मंगलवार को टुटी जब उत्तरी दिल्ली पूरी तरह जल चुका था।
गृह मंत्रालय और मोदी सरकार दंगे को रोकने में पूरी तरह विफल रही है बलकि बीजेपी के ही कुछ लोग इस दंगे के मासटरमाइंड बताए जा रहे हैं।
delhi riots
In North East Delhi, Muslim homes, shops and properties were burnt and looted, with complete planning. Prime Minister Narendra Modi was busy welcoming Trump and Home Minister was sleeping when North East Delhi was completely burnt. The Ministry of Home Affairs and the Modi Government have completely failed to stop the riots, but some people of BJP are being told to be the masterminds of this riot.

How did the violence start in North East Delhi and who is responsible for this bloody game?

दिल्ली में हिंसा कैसे भड़की और कौन है इस खूनी खेल का जिम्मेदार?


दिल्ली में पिछले दो तीन दिनों के दौरान वह सब कुछ हुआ, जो कि 2002 में गुजरात में हुआ था, जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और अमित शाह वहां के गृह मंत्री, मोदी अब देश के प्रधानमंत्री हैं और अमित शाह देश के गृह मंत्री।
उत्तरी दिल्ली में पूरी योजना के साथ, मुस्लिम घरों, दुकानों और संपत्तियों को जला दिया गया, लूट लिया गया।

विभिन्न मीडिया वेबसाइटों और समाचार चैनलों के संवाददाताओं के माध्यम से दंगे  के शिकार पीड़ितों की जो खबर आ रही है और सोशल मीडिया पर जो वीडियो, तस्वीरें और ऑडियो सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले और दिल दहलाने वाले हैं।
मुस्लिम घरों और दुकानों को नियमित रूप से जलाया गया हैऔर सभी बुजुर्गों, बच्चों, महिलाओं को मारा पीटा गया है।

अभी तक 28 लोगों के मरने की खबरें आ रही हैं, उनमें से दो-तिहाई से अधिक मुसलमान हैं। लेकिन वास्तव में कितने लोग इस हत्याकांड के शिकार हुए और मारे जा रहे हैं, पूरे तौर पर पता नही चल पाया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्रम्प का स्वागत करने में व्यस्त थे और गृह मंत्री अमित शाह की नींद मंगलवार को टुटी जब उत्तरी दिल्ली पूरी तरह जल चुका था।
 मीडिया की रिपोर्ट है कि पिछले 24 घंटों में उन्होंने दिल्ली में स्थिति को नियंत्रित करने के लिए तीन बार उच्च स्तरीय बैठकें कीं, केरल की अपनी यात्रा को रद्द कर दिया है और दिल्ली में कानून और व्यवस्था की बहाली की जिम्मेदारी National Security Advisor (NSA) Ajit Doval (अजीत डोभाल) को सौंप दिया गया है।
अजीत डोभाल सीधे मोदी और मंत्रिमंडल को रिपोर्ट करेंगे।

यह खबर है कि, कल रात और आज, उन्होंने दंगा क्षेत्रों की समीक्षा की और विभिन्न धर्मों के नेताओं के साथ बैठक कर स्थिति को काबो करने के सिलसिले पर चर्चा की।

यह सब हो रहा है, लेकिन स्थिति अब भी लगभग वैसी ही है; सिलमपुर, जाफराबाद, शाहदरा, कर्दमपुरी, मोजपुर, खजुरी खास, गोकुल पूरी में अभी भी रह रह कर पत्थरबाजी और उग्रवाद की खबरें आ रही हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रम्प की सेवा से फारिग होने के बाद आज ट्वीट करके दिल्ली के लोगों से शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने की अपील की है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली में सैनिकों को बुलाने के लिए गृह मंत्री से अपील की थी, लेकिन मंत्रालय ने इसे अस्वीकार कर दिया, हालांकि, दंगों वाले इलाकों में अधिक रिजर्व पुलिस बल को तैनात किया गया है।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में सोमवार रात भड़की हिंसा की रूआत कैसे हुई?

CAA, NRC और NPR के खिलाफ विरोध प्रदर्शन दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में पिछले दो महीनों से हो रहे हैं और ये सभी विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण थे।
शुरुआत में, सिलमपुर के इलाके में कुछ झड़प हुई और जामिया और शाहीन बाग के प्रदर्शनकारियों पर हिंदू संगठनों से जुड़े आतंकवादियों दवारा गोलियां चलाई गईं, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने खुद कुछ नहीं किया, जिससे देश की कानून-व्यवस्था बाधित हो और राष्ट्रीय अखंडता को नुकसान पहुंचे।

22 फरवरी की रात को, खबर आई कि सीएए के खिलाफ प्रदर्शन कर रही महिलाओं ने जाफराबाद मेट्रो स्टेशन को घेर लिया है।
दरअसल शनिवार रात CAA, NRC और NPR के खिलाफ धरने पर बैठी महिलाएं जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के पास आ गई थीं. धरना प्रदर्शन की वजह से सड़क बाधित हो रहा था, पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से हटने को कहा, लेकिन वे नहीं माने।

उसी दिन, भाजपा के पराजित नेता कपिल मिश्रा ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली के डीसीपी वेदप्रकाश की मौजूदगी में एक धमकी भरा बयान दिया, जिसमें कहा गया कि पुलिस जाफराबाद के प्रदर्शनकारियों को जलदी हटा ले, अन्यथा हम ट्रम्प के आने तक तो चुप रहेंगे, लेकिन उसके जाने के बाद हम पुलिस की भी नहीं सुनेंगे।

बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने CAA के विरोध में धरना बैठे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ एक और वीडियो पोस्ट की और CAA समर्थकों से रविवार दोपहर तीन बजे तैयारी के साथ मौजपुर चौक आने को कहा।
रविवार रात को एक वीडियो पोसट किया गया, जिसमें कुछ लोग 'जय श्रीराम' का नारा लगाते हुए एक ट्रक से बहुत सारे ईंटें पतथर उतारते दिख रहे हैं।

उसको बाद उसी रात को (सोमवार रात) पूर्वोत्तर दिल्ली में दंगे भड़क गए, यह सिलसिला सोमवार और उसके बाद भी जारी रहा।
प्रारंभ में, CAA समर्थक और CAA विपक्षी समूह आमने सामने आएएक ओर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोधी थे और एक ओर इसके समर्थक और उनको दरमियान पत्थरबाजी होने लगी, लेकिन इस झड़प ने दंगे का रूप ले लिया और चुंकि CAA के समर्थक पहले से ही तैयार होकर आए थे और मुसलमानों के खिलाफ व्यवस्थित हमले होने लगे।

सोमवार सुबह से ही इन इलाकों में हालात तनावपूर्ण रहे और देखते ही देखते भारी हिंसा भड़क उठी।
कटटर पंथी हिंदूओं नें कुछ मिश्रित आबादी वाले इलाकों में नियमित रूप से मुस्लिम घरों को चिह्नित किया और बाद में उन्हें लूटा और उन्हें आग के हवाले कर दिया।

अशोक नगर का एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें पंद्रह या बीस साल के लड़के एक मस्जिद के मीनार पर चढ़कर भागवा झंडा लहरा रहे हैं और नीचे मस्जिद के विभिन्न हिस्सों को नष्ट कर दिया गया है।

एक मदरसे के बारे में खबर है कि उसे जला दिया गया है, उसके कई छात्रों को भी शहीदकर दिया गया है।
एक वीडियो में, दस बारह साल का एक लड़का भजनपुरा में एक मजार को जलाता दिखाई पर रहा है। इस तरह की मानवता को शर्मशार कर देने वाले दसियों दृश्य सामने आए हैं, लेकिन कई और भयानक दृश्य हैं जो अभी सामने नहीं आ सके हैं।

कैसे सरकार ने अपनी आंखें बंद रखी?

इस पूरे मामले में, मोदी सरकार का रवैया बहुत ठंडा रहा है, मोदी की नाक के नीचे देश की राजधानी दिल्ली में आग और खून की होली खेली जाती रही; लेकिन मादी पूरी उदासीनता के साथ सरकारी पैसे से अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ दोसती के मजे लेते रहे और अपनी मित्रता के गुण गाते रहे और दिल्ली को जलता कटता छाड़ दिया, देश में किया हो रहा है इसकी जरा भी परवाह नहीं की। 

गृह मंत्री अमित शाह भी न जाने किस गुफा में घुसे हुऐ थे कि पूरे दो दिन बाद उनकी प्रतिक्रिया सामने आई जबकि दिल्ली में बलकि पूरे देश में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी मोदी सरकार और गृह मंत्री अमित शाह के हवाले है।फिर भी सरकार और मंत्रालय ने इस दंगे को रोकने के लिऐ कोई ठोस कदम नही उठाया और दिल्ली को 2002 का मोदी और अमित शाह वाला गुजरात बनने दिया। क्या गुजरात मोडल इसी का नाम है?

कुछ विडियोज ऐसी भी सामने आईं हैं जिन में कुछ पुलिस वाले भी दंगाइयों के साथ पत्थरबाजी करते दिख रहे हैं , यह सब क्या हो रहा हैै? क्या हिंदुस्तान जंगल राज की तरफ बढ रहा है

यही पुलिस जामिया की लाइब्रेरी में घुस कर वहां पढ रहे विद्यार्थियों को बुरी तरह मारती है और जेएनयु में हमला करने वाले गुंडों को गेट पास कराती है और दिल्ली के दंगे में खामूश तमाशाई बनी रहती है।

ऐसा नहीं है कि पुलिस का बरताव मुसलिम विरोधी है बलकि पुलिस केवल उन लोगों का साथ देती है जो सरकार के पक्ष में खड़ा हो और उसके हर सही गलत फैसले को दिल से मानता हो और एक विशेष विचार रखता हो। 

दुर्भाग्य से, यह हिंदुस्तान की तारीख रही है कि यहां जितने भी आपसी दंगे हुऐ, उसमें पुलिस की बड़ी भुमीका रही है, चाहे इसका अंदाज कुछ भी हो और सरकार किसी की भी हो। 

अगर बात करें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की, तो उन्होंने भी शर्मनाक प्रतिक्रिया व्यक्त की।
पहले तो पूरे मामले को टालते रहे कि कानून व्यवस्था हमारे हाथ में नहीं है, एक हल्का सा ट्वीट करके अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। फिर नाटक करने के लिए राज घाट पहुंच गऐ और दिल्ली जल रही थी। 
मंगलवार को गृह मंत्रालय के साथ बैठक की और निश्चित होकर बैठ गए, अब वे कह रहे हैं कि दिल्ली में कानून व्यवस्था बनाने के लिए सेना को उतारना चाहिए।
लोग जानते हैं कि यह वही केजरीवाल हैं जो अपनी सरकार को मजबूत करने के लिए राज्यपाल के घर के बाहर धरना प्रदर्शन कर चुके हैं।

चुनाव से पहले जामिया और शाहीन बाग में हुई फायरिंग या CAA और NRC के खिलाफ प्रदर्शनों में मारे गए लोगों; बल्कि, उन्होंने पूरे मामले पर ही अपना पक्ष साफ नहीं किय़ा।
शुरुआत में एक चैनल को इंटरव्यू देते हुए उन्होंने NRC पर बात की, जिससे मुस्लिम खुश होगऐ और बाद में आम आदमी पार्टी के लोग उनका डिफनस (बचाव) करने लगे कि अगर वह खुले तौर पर शाहीन बाग या CAA पर बात करेंगे, तो चुनाव में नुकसान होगा,
लेकिन अब जब उनकी सरकार फिर से प्रचंड बहुमत के साथ बन चुकी है,
फिर भी उनकी जुबान नहीं खुल रही है, अभी तक उनके मुंह से एक शब्द ऐसा नहीं निकला है, जिससे अल्पसंख्यक को दिलासा और तसल्ली मिल सके।

अमित शाह और मोदी से कोई अपेक्षा नहीं है कि ये दोनों एक ही पेशे के लोग हैं, लेकिन केजरीवाल को तो मुसलमानों ने एक उम्मीद के साथ एकतरफा वोट दिया है:
कि वे व्यवहारिक न सही, मौखिक रूप से तो अपनी सहानुभूति व्यक्त करेंगे। 
 दंगा पीड़ितों से मिलने के लिए जीटीबी अस्पताल गए, लेकिन बयान ऐसा दिया
जिसकी उम्मीद एक मुख्यमंत्री से नहीं की जा सकती, बिल्कुल ढीला ढाला और लचर, कायरता से भरा, जबकि वे खुद कभी शीला दीक्षित को कायरता और डरपोक होने का ताना दिया करते थे।

दिल्ली चुनावों के दौरान, कई राजनीतिक विश्लेषकों ने चिंता व्यक्त की थी कि केजरीवाल भाजपा को हराने के लिए एक समान दृष्टिकोण अपना रहे हैं, अगर यह केवल एक राजनीतिक रणनीति थी, तो ठीक है, लेकिन उनकी रणनीति से लगता है कि वह भाजपा के हिंदुत्व का मुकाबला करने के लिए हिंदुत्व का एक नया संस्करण शुरू कर रहे हैं और व्यावहारिक रूप से पूरी तरह एक तमाशा साबित हो रहे हैं।

अब सवाल यह है कि इस नफरत और झगड़े को को कैसे खतम किया जा सकता है जब गृह मंत्रालय और मोदी सरकार दंगे को रोकने में पूरी तरह विफल रही है बलकि बीजेपी के ही कुछ लोग इस दंगे के मासटरमाइंड बताए जा रहे हैं?

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